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दिव्यांग होने में बच्चे का दोष नहीं, वे बन सकते हैं हमारे कुलदीपक / Shivpuri News

शिवपुरी। चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन एवं सेवा भारती की 36वीं ई-संगोष्ठी में रविवार को दृष्टिबाधित बालकों की व्यवहारिक समस्याओं पर गंभीर चिंतन हुआ। ई-संगोष्ठी को संबोधित करते हुए एनएबी के सचिव उदय हथवलने ने कहा कि दृष्टिबाधित बच्चों को जन्म लेते ही एक तरह की पारिवारिक अवहेलना और उदासीनता का शिकार होना पड़ता है। दिव्यांगता के साथ जन्म लेने वाले बच्चों का इसमें खुद कोई दोष नहीं होता है। इस व्यवहार परिवर्तन की गंभीर चुनौती से आज भी हमारा समाज जूझ रहा है। हमें यह सोचना चाहिए कि दृष्टिबाधित भी हमारे कुलदीपक बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि समाज के मनोविज्ञान को बदलने के लिए परिवार के स्तर पर एकजुट होने की आवश्यकता है। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि परिवार के संबल से दृष्टिबाधित बालक भी सामान्य बच्चों की तरह उपलब्धियों से परिवारों को अलंकृत कर सकते हैं।

उदय हथवलने ने कहा कि दृष्टिबाधित बालक को सबसे बड़ा संबल उसके मातापिता ही दे सकते है। सबसे पहले शिक्षा उपलब्ध कराने के प्रति हमें ऐसे परिवारों को सामाजिक रूप से प्रेरित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षण में आज भी तमाम व्यावहारिक दिक्कते आ रही है, लेकिन हम प्रयास करें तो सामान्य बच्चों के साथ भी वे एकरस होकर जीवन यापन कर सकते हैं। शिक्षण क्षेत्र की व्यावहारिक दिक्कतों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि दृष्टिबाधित बच्चों की पढ़ाई एकीकृत शिक्षण व्यवस्था के स्थान पर विशेष विद्यालयों एवं विशेष शिक्षकों के माध्यम से ही सुनिश्चित की जानी चाहिए क्योंकि दृष्टिबाधित बालकों के लिए अपेक्षित मौलिक व्यवस्थाएं सामान्य स्कूलों में संभव नही है।

कोविड ने सिखाया आपदा को अवसर कैसे बनाएं: गोलकर

भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य एवं मप्र ब्लाइंड क्रिकेट टीम के कप्तान सोनू गोलकर ने ई-संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि दृष्टिबाधित हो जाने पर बच्चों को अकेलेपन से जुझना एक सामान्य मनोविज्ञान है। उन्होंने कहा कि दृष्टि का न होना या चले जाना एक समस्या हो सकता है, लेकिन इसे जीवन की अभिशप्तता नहीं बनने देना चाहिये। उन्होंने कहा कि जिस तरह समाज में रंग, वर्ण, सामर्थ्य की विविधता के साथ जीवन सहजतापूर्ण चलता है, ठीक वैसे ही दिव्यांगता को लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन का हर दौर चुनौतियों से भरा होता है, इसलिए दिव्यांगता को न्यूनतामूलक वैशिष्ट्य नहीं बनाया जाना चाहिए। कोविड संकट हमें सिखाता है आपदा को अवसर कैसे बनाया जाए इसलिए दिव्यांगजन भी देश की सेवा में अपना योगदान सामान्यजन की तरह दे सकते है।

रतियोगी परीक्षाओं का सिलेबस ब्रेल फॉर्मेट में नहीं

शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पदस्थ दृष्टिबाधित व्याख्याता इरफान हैदर ने बताया कि दृष्टिबाधित बच्चों के लिए हमनें कोविड संकट में ई-मॉड्यूल में पाठ्यक्रम निर्मित किया है। दिव्यांग बच्चों के बीच काम कर रहे मनोज शर्मा ने बताया कि विशेष शिक्षक और शिक्षणोत्तर गतिविधियों के लिए अभी बहुत अधिक कार्य करने की जरूरत है। छात्रावासों की कम संख्या को लेकर दृष्टिबाधित छात्र गौरव ने भी अपनी समस्याओं को साझा करते हुए बताया कि प्रतियोगी परीक्षाओं का सिलेबस या अन्य साधन ब्रेल फॉर्मेट में आसानी से उपलब्ध नहीं है।

दिव्यांगता अभिशाप नहीं, हौसलों की पाठशाला है

राजगढ़ से जुड़े 11वीं के छात्र गिरिराज शर्मा ने बताया कि सामान्य स्कूलों में समानता का व्यवहार आज भी सहजता से उपलब्ध नहीं है। खंडवा कॉलेज से जुड़े दिव्यांग मोती सिंह ने कहा कि चुनौतियों से घबराने की नहीं, बल्कि उनका मुकाबला करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मप्र में पीएससी, यूपीएससी की तैयारियों में लगे हुए छात्रों को मार्गदर्शन देने के लिए एक फॉरम होना चाहिए। ई-संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. राघवेंद्र ने कहा कि दिव्यांगता अभिशाप नही है बल्कि यह हौसलों की पाठशाला है। परिवार स्तर पर प्रबोधन की आवश्यकता पर जोर देते हुए डॉ. राघवेंद्र ने कहा कि संबद्ध परिवार के लोगों को जोड़कर एक दबाब समूह का गठन गुना शहर की तर्ज पर किया जाना चाहिए। बालिकाओं को लेकर उन्होंने विशेष प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। संचालन फाउंडेशन के सचिव डॉ. कृपाशंकर चौबे ने किया। आभार ग्वालियर सीडब्ल्यूसी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. केके दीक्षित ने माना।

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