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शास्त्री जी के नैतिक एवं साहसिक पक्ष को साजिशन दरकिनार किया गया / Shivpuri News

* विमर्श:पुण्य तिथि पर आयोजन*

शिवपुरी। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न लालबहादुर शास्त्री का बहुआयामी जीवन सार्वजनिक विमर्श में अपेक्षित स्थान क्यों नही बना पाया है इस सवाल का जबाब आज ईमानदारी से खोजने की आवश्यकता है।एक ही परिवार के वंश-अंश से वास्ता रखने वाले लोग देश के संसाधनों,सम्मान,प्रतिष्ठा पर काबिज क्यों रहे है? क्या शास्त्री जी के अवदान को साजिशन राष्ट्रीय विमर्श से किनारे किया गया ताकि उनके द्वारा खीचीं गई नैतिक शुचिता की परिपाटी राजनीतिक कर्म में स्थापित न हो सके?ऐसे ही तमाम सवालों के साथ आज विश्व संवाद केंद्र के आभासी विमर्श में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को याद किया गया।इस विमर्श में मोटिवेशनल स्पीकर पंकज चतुर्वेदी,पत्रकार रत्नाकार त्रिपाठी,वैभव गुप्ता एवं तमिलनाडू केंद्रीय विवि के प्रोफेसर डॉ आनन्द पाटिल सहित देश भर से अनेक बुद्धिजीवियों,रिसर्च स्कॉलर ने भाग लिया।

पंकज चतुर्वेदी ने शास्त्री जी के सम्पूर्ण जीवन के नैतिक पक्ष को बहुत ही प्रामाणिकता के साथ रेखांकित करते हुए कहा कि वे अगर प्रधानमंत्री के पद पर अपना कार्यकाल पूरा करते तो देश मे कभी आपातकाल लगाने जैसे पाप नही होते,क्योंकि शास्त्री जी कानून से अधिक नैतिक शुद्धता को आत्मसात करके जीते थे।

श्री चतुर्वेदी ने एक नए साम्य की तरफ ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि शास्त्री जी के जीवन के साथ ,महात्मा गांधी,दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि में आचरण की समानता स्पष्ट दिखाई देती है।देश के संसाधनों पर सबसे वास्तविक जरूरतमंद का हक औऱ अंत्योदय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता शास्त्री विचार में नजर आती है।

पत्रकार रत्नाकर त्रिपाठी ने कहा कि नेहरू जी के 16 साल के शासन के आगे शास्त्री जी के डेढ़ साल के कार्यकाल को समयसीमा के आधार पर कमतर करने की कोशिश की जाती हैं।श्री त्रिपाठी के मुताबिक नेहरू जी दौर में सेनाओं का आत्मबल कमजोर किया गया।1947में कबाली हमला,1962 में चीनी पराजय,तिब्बत पर समर्पण इसकी मिसाल है लेकिन शास्त्री जी ने 1965 में लाहौर तक तिरंगा लहराकर भारतीय सेना के पराक्रम से विश्व को परिचित कराया।अमेरिकी दबाब को दरकिनार कर देश में आत्मबल का पुनर्जागरण सुनिश्चित किया और जय जवान जय किसान जैसा कालजयी नारा गढ़ा।इस नारे ने ही आज के भारत की बुनियाद रखी।

स्कॉलर वैभव गुप्ता ने बताया कि कैसे निजी जीवन की पारदर्शिता और शुचिता को शास्त्री जी लोकजीवन का हिस्सा बनाने का काम किया।प्रधानमंत्री रहते हुए जब एक दिन उनके पुत्र ने सरकारी गाड़ी का उपयोग कर लिया तो अगले दिन इस कार्य के बदले उन्होंने सरकारी कोष में किराया जमा कराया था।ऐसी जीवन दृष्टि आज लोक विमर्श औऱ व्यवहार से गायब हो गईं है।

डॉ आनंद पाटिल ने शास्त्री जी को स्मरण करते हुए सवाल उठाया कि उनके जाने के बाद शास्त्री युग को गोविंद बल्लभ पंत की सरकार के एक मंत्री के बाद देश के रेल,गृह,परिवहन मंत्री के रूप में उनकी सेवाओं और उच्च नैतिक मापदंडों को क्यों आगे नही बढ़ाया गया है।क्या प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्री जी को इसलिए प्रतिष्ठित नही किया जाता रहा है ताकि जनमत हर प्रधानमंत्री से शास्त्री जैसी सादगी,सरलता और ईमानदारी की अपेक्षा न करने लगे।

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