विश्व थैलेसीमिया दिवस पर वर्चुअल संगोष्ठी आयोजित, भविष्य में और किसी के परिवार को यह दंश न झेलना पड़े, इसके लिए जरूरी है समाज में जागरूकता लाना : रवि गोयल / shivpuri News


शिवपुरी। थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त रोग है, जिसमें मरीज के भीतर खून का ठीक से निर्माण नहीं हो पाता है। इसकी वजह से रोगी को बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। यह रोग न केवल रोगी के लिए कष्टप्रद होता है, बल्कि परिवार खासकर रोगी के माता-पिता को भी झकझोर देता है। भविष्य में और किसी के परिवार को यह दंश न झेलना पड़े। इसके लिए जरूरी है समाज में जागरूकता लाना यह कहना था शक्तिशााली महिला संगठन के संयोजक रवि गोयल का को कि आज विश्व थैलेसीमिया दिवस पर आयोजित वर्चुअल संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के तौर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।

 

प्रोग्राम में डॉक्टर चित्रा श्रीवास्तव ने कहा कि थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रोग है और माता अथवा पिता या दोनों के जींस में गड़बड़ी के कारण होता है। रक्त में हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है। पहला अल्फा और दूसरा बीटा ग्लोबिन। दोनों में से किसी प्रोटीन के निर्माण वाले जींस में गड़बड़ी होने पर थैलेसीमिया रोग होता हैं। इस रोग में शरीर में लाल रक्त कण/ रेड ब्लड सेल(आरबीसी) नहीं बन पाते हैं और जो थोड़े बन पाते हैं वह केवल थोड़े समय तक ही रहते हैं। थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसा न करने पर बच्चा जीवित नहीं रह पाता। उन्होंने कहा कि थैलेसीमिया तीन प्रकार का होता है


मेजर थैलेसीमिया: यह बीमारी उन बच्चों को होती है, जिनके माता और पिता दोनों के जींस में गड़बड़ी होती है। यदि माता और पिता दोनों थैलेसीमिया माइनर हों तो होने वाले बच्चे को मेजर थैलेसीमिया होने का खतरा अधिक रहता है।


माइनर थैलेसीमिया: यह बीमारी उन बच्चों को होती है, जिन्हें प्रभावित जींस माता या पिता द्वारा प्राप्त होता है। इस प्रकार से पीड़ित थैलेसीमिया के रोगियों में अक्सर कोई लक्षण नजर नहीं आता है। यह रोगी थैलेसीमिया वाहक होते हैं।


हैड्रोप फीटस: यह एक बेहद खतरनाक थैलेसीमिया का प्रकार है, जिसमें गर्भ के अंदर ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है या पैदा होने के कुछ समय बाद ही बच्चा मर जाता है । थैलेसीमिया का इलाज करने के लिए नियमित रूप से खून चढ़ाने की जरूरत होती है। कुछ रोगियों को हर 10 से 15 दिन में रक्त चढ़ाना पड़ता है। ज्यादातर मरीज इसका खर्चा नहीं उठा पाते हैं।


सामान्यत: पीड़ित बच्चे की मृत्यु 12 से 15 वर्ष की आयु में हो जाती है। सही उपचार लेने पर 25 वर्ष से ज्यादा समय तक जीवित रह सकते हैं।

 

अंत में रवि गोयल ने कहा कि थैलेसीमिया को रोकने के लिए यह कर सकते है कि हमारे समाज में खासकर हिन्दू धर्म में शादी से पहले लड़का और लड़की की कुंडली मिलाई जाती है। मगर यदि हमें बच्चों को थैलेसीमिया होने से बचाना है तो लड़का और लड़की की स्वास्थ्य कुंडली मिलाया जाना बेहद जरूरी है। जिससे पता चल सके की उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं। स्वास्थ्य कुंडली में थैलेसीमिया, एड्स, हैपेटाइटिस-बी और सी, आरएच फैक्टर आदि जांचें शामिल हैं। आज वैद्यकीय विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है कि जागरूक रहकर हम थैलेसीमिया जैसी कई जानलेवा बीमारियों से बच सकते हैं।  प्रोग्राम में संस्था के वॉलंटियर पूजा शर्मा, साहब सिंह धाकड़, राकेश राजे , प्रफुल सोनी , सुपोषण सखी रचना लोधी, न्यूट्रीशन चैम्पियन सोनम शर्मा ने भाग लिया ये लोग मैदानी स्तर पर आगे अपनी बात रखेंगे।

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