दोषपूर्ण मूल्यांकन पद्वति से खड़ा है परीक्षाओं का ख़ौफ़:पाराशर / Shivpuri News

*ऑनलाइन क्लासेज से 30 फीसदी बच्चों की आंखे प्रभावित हुई-डॉ सोनी
* चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 35 वी ई संगोष्ठी में परीक्षाओं में तनाव पर सार्थक संवाद*


शिवपुरी। चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन एवं सेवा भारती की 35 वी ई संगोष्ठी में आज परीक्षाओं को लेकर बालमन की दुविधाओं एवं मनोविज्ञान पर उपयोगी चर्चा की गई।देश की ख्यातिनाम बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ डॉ ज्योति सोनी (केंद्रीय विद्यालय भोपाल)ने अपने 30 बर्षीय शैक्षणिक एवं शिक्षणोत्तर अनुभव के आधार पर कोविड काल की व्यवहारिक परेशानी पर प्रकाश डाला।डॉ सोनी के अनुसार ऑनलाइन कक्षाओं ने बाल सुलभ जिज्ञासाओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है।

इस दौरान बच्चों का स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ गया है इससे स्वाभाविक शारीरिक विकास भी अवरुद्ध हुआ है।श्रीमती सोनी ने कोविड काल के प्रभावों पर किये अपने अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि ऑनलाइन क्लासेज के चलते
30 प्रतिशत बच्चों की आंखों का नम्बर बढ़ा हुआ पाया गया है
50 फीसदी बच्चों में मोटापे (ओबिसिटी) शिकायत सामने आई हैं।इसके अलावा बच्चों की
फिजीकल एक्टिविटी  बुरी तरह सेप्रभावित हुई है जिसके चलते देश के अधिसंख्य बच्चों में यह शिकायत सामने आई है कि वे
मानसिक रूप से खुद को स्वतंत्र महसूस  नही कर पा रहा  है।
 डॉ सोनी ने बताया कि शिक्षक -बालक  समय प्रबंधन भी इस बर्ष खत्म प्रायः रहा है क्योंकि शिक्षकों ने भी अपनी सुविधानुसार अपने दायित्व को निभाने का प्रयास किया इसके चलते विद्यालयीन सततता से सीखने का तत्व गायब हो गया।
डॉ सोनी के अनुसार टीचर्स के मध्य भी एक बड़ा तनाव  इस दौरान देखा गया है क्योंकि स्कूल में छोटे छोटे कार्यक्रम तनाव घटाने का माध्यम होते है लेकिन एक साल से यह प्रक्रिया बाधित हो गई ।टीचर औऱ बच्चों के बीच  स्वाभाविक रिश्ते की डोर भी इस दौरान कमजोर रही है।सर्वे बताता है कि
50 फीसदी बच्चों के मध्य शिक्षक की  मूल भूमिका सीमित हुई है। उन्होंने बताया कि विचारों का विनिमय सीखने की बुनियाद है लेकिन कोविड ने इसे खत्म कर दिया गूगल त्वरित प्रदर्शन का आधार तो बन सकता है लेकिन यह स्थाई नही है। 


उन्होंने बताया कि ऑनलाइन अवधि में बच्चों का डिजिटली प्रदर्शन
36 फीसदी बढ़ा है लेकिन पर्यवेक्षण सन्दिग्ध होने के कारण यह स्थिति ऑफलाइन पद्वति में एक भय का वातावरण निर्मित कर रहा है बच्चे डरे हुए है कि उनका प्रदर्शन परीक्षा हॉल में भी वैसा ही होगा या नही? उन्होंने बताया कि एक साल के कोविड पीरियड में जो विसंगति खड़ी हो गईं है उसे पुनः परम्परागत स्वरूप में लाने के लिए शिक्षकों और अभिभावकों को कठिन पराक्रम अपनाना होगा।बच्चों के दैनंदिन व्यवहार में एक बड़ा बदलाव ऑनलाइन व्यवस्था ने ला दिया है वे अपनी पढ़ाई के प्रति ईमानदार नही रहे है क्योंकि इस दौरान उनके प्रदर्शन में गूगल की मदद ली गईहै और जब वे कक्षा में आकर परीक्षा देते है तो उनका प्रदर्शन गिर रहा है।इस स्थिति में बच्चों के मध्य एक तनाव स्पष्ट देखा जा रहा है। चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपा शंकर चौबे ने संगोष्ठी में  पीसा के एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया कि
59 फीसदी बच्चों में परीक्षा को लेकर यह धारणा रहती है कि परीक्षा एक कठिन दौर होता है।
66 फीसदी को यह डर लगता है कि उनके अंक परीक्षा में कम आएंगे
55 फीसदी लड़कियों को लगता है कि
 लड़कों की तुलना में उनके अंक कम आएंगे।


5 में से एक बच्चे ने यह माना कि उसे कक्षा में  शिक्षक ने एक बार हर्ट किया है।
बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ सुधाकर पाराशर( प्राचार्य उत्कृष्ट विधालय )ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बताया कि शिक्षण व्यवस्था के किसी भी स्टेकहोल्डर्स की सेवा न्यूनता का खामियाजा अंततः बच्चों को उठाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि शिक्षक पालक बैठक परम्परागत रूप से बच्चों के मूल्यांकन को अंकों की सारहीन प्रतिस्पर्धा तक सीमित करते है।इसलिए इन बैठकों में नवाचार जोड़ने की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि अंक सूची या रिपोर्ट कार्ड के प्रति जरूरत से ज्यादा से केन्द्रीयकरण एक समावेशी मूल्यांकन का प्रतीक नही है।हमें मूल्यांकन की इस पद्वति को बदलने की आवश्यकता है।

 


रिपोर्ट कार्ड  ट मेडिकली टेस्ट  मात्र के महत्व का होना चाहिये औऱ इसके आधार पर बच्चों में सुधार की कवायद सुनिश्चित करनी चाहिये।दुर्भाग्य से अंक सूची बच्चों के प्रति पारिवारिक सामाजिक नजरिये को निर्धारित करने लगती है।हमें उन परिस्थितियों को चिन्हित करना चाहिये जो रिपोर्ट कार्ड में बच्चे की न्यूनता की वजह बनती हैं। श्री पाराशर के अनुसार आज आवश्यक है कि हम एग्जाम फोबियो से  बचपन को निकालने की कार्ययोजना पर काम करें।जिन बच्चों के रिपोर्ट कार्ड खराब है उन्हें अतिरेक सरंक्षण औऱ प्रेरणादायक वातावरण उपलब्ध कराएं।एक अच्छे शिक्षक को हमेशा यह प्रयास  भी करना चाहिए कि बच्चों को परीक्षा के भय से बाहर कैसे निकाला जाए। मौजूदा सन्दर्भ में समावेशी वातावरण निर्माण की आवश्यकता पर जोर देते हुए श्री पाराशर ने  बच्चों के अलावा शिक्षकों एवं अभिभावकों के उन्मुखीकरण को सामयिक जरूरत निरूपित किया। उन्होंने कहा कि स्कूल में क्लास रूम बालक  की अपार प्रतिभा में से केवल कुछ अंशों के प्रकटीकरण का मंच  मात्र है।  संवेदना,सीखने का गुण, कौशल  एवं अंतर्निहित क्षमताओं का उन्नयन तो कक्षाओं के बाहर ही होता है इसलिए स्कूल औऱ उनके रिपोर्ट कार्ड  ही व्यक्तित्व को  निर्धारण नही करते हैं इस तथ्य को सभी को समझना चाहिये। उन्होंने बताया कि अभिभावकों को चाहिये कि वे परीक्षाओं में एक मित्रवत वातावरण निर्मित करें।उन्हें  यह  भी समझना चाहिये कि गूगल प्लेटफॉर्म ने बालमन को भी भटकाने का काम किया है। क्योंकि सोशल मीडिया का मर्यादित उपयोग करने में अभिभावक भी ईमानदार नही रहते है ऐसे में हम दुनिया के प्रति जिज्ञासाओं की अपार उत्कंठा लिए बालमन से संयम की अपेक्षा कैसे कर सकते है।श्री पारासर ने अभिभावकों से  आग्रह किया कि वे बच्चों पर
अंकों का दबाब बनाने के स्थान पर इन बातों को फोकस भी करें कि
बच्चा कितना ईमानदार है


कितना संवेदनशील है
कितना सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधियों में निपुण है।ऐसा करने पर ही हम अच्छे नतीजे ला सकते है।श्री श्री पाराशर ने बताया कि
विद्या बन्धनों से मुक्त करती है जबकि रिपोर्ट कार्ड केंद्रित
मूल्यांकन पद्वति बन्धनों में उलझाने का सबब है।
उन्होंने इस बात पर संतोष जताया कि
नई शिक्षा नीति अंक नही सीखने पर जोर देने वाली है।यह बेसिक नॉलेज को उत्पादकीय कौशल से जोड़ने की वकालत करती है।इसका क्रियान्वयन अगर ईमानदारी से हो तो मौजूदा दोषपूर्ण मूल्यांकन पद्वति से निजात मिल सकेगी।

संस्था के अध्यक्ष डॉ राघवेंद्र ने कहा कि शिक्षक की बहुआयामी भूमिका को आज समाज में शिद्दत से महसूस की जा रही है।उन्होंने कहा कि शिक्षक की गोद में विध्वंस औऱ सृजन दोनों पलते है।उन्होंने नई शिक्षा नीति को लेकर भी अपने विचार साझा किए।
ई संगोष्ठी में मप्र के अलावा बिहार,यूपी,बंगाल,आसाम,राजस्थान,मणिपुर,गोवा,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र,के प्रतिभागियो ने शिरकत की।आभार प्रदर्शन ग्वालियर के पूर्व अध्यक्ष डॉ केके दीक्षित ने व्यक्त किया।

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