शनिवार रविवार को रहेगा पुष्य नक्षत्र : पं लक्ष्मीकांत शर्मा / Shivpuri News


दीपावली से पूर्व खरीददारी के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त आज, पुष्य नक्षत्र आज से दीपावली तक 
शिवपुरी। दीपावली 14 नवंबर को है। इस मौके पर खरीदारी करने पुष्य नक्षत्र को शुभ माना जाता है। इसके सात दिन पहले पुष्य नक्षत्र का योग है, जो कि खरीदारी के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। इस बार शनिवार और रविवार को पुष्य नक्षत्र का योग बन रहा है। ज्योतिष के अनुसार इस दिन शुभ कार्य, पूजा और घर के  उपयोगी सामान के साथ नए वाहन और आभूषण की खरीदारी को श्रेष्ठ माना गया है। शनिवार को त्रिपुष्कर योग है। इसके साथ ही रविवार को रवि पुष्यामृत योग, सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। 

पं. लक्ष्मीकांत शर्मा मंशापूर्ण मंदिर ने बताया कि इस शुभ संयोग के चलते होने वाली खरीदारी से घर में सुख और समृद्धि बढ़ती है। शनिवार सुबह 8:04 बजे से शुरू होकर पुष्य योग रविवार सुबह 8:44 बजे तक रहेगी। शनिवार पूरे दिन पुष्य नक्षत्र होने से शनि पुष्य योग बनेगा। इन दोनों योग के दौरान दोनों दिन को खरीदारी के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इस दौरान स्वर्ण आभूषण, चांदी के बर्तन और आभूषण, घर-जमीन की रजिस्ट्री, रसोई के सामान और बर्तन खरीदने से घर में समृद्धि बढ़ती है।

पुष्य नक्षत्र में क्या करें
इस दिन स्वर्ण आभूषण खरीदने से समृद्धि बनी रहती है।
इस दिन नई जमीन, मकान खरीदना, वाहन खरीदना भी शुभ होता है।
इस दिन मोती शंख या दक्षिणावर्ती शंख को अपनी दुकान या प्रतिष्ठान में स्थापित करने से व्यापार में तरक्की होती है।
इस दिन विष्णु सहित माता लक्ष्मी की उपासना और श्री यंत्र की खरीदी करके जीवन में समृद्धि लाई जा सकती है।
इस दिन नए व्यापार और व्यवसाय की शुरुआत करना भी श्रेष्ठ माना जाता है।

खरीदारी शुभ मुहूर्त 

शनिवार सुबह 8.04 बजे से रविवार सुबह 8.44 बजे तक। यह पुष्य नक्षत्र 24 घंटों का है। इस दौरान खरीदारी करने से घर में सुख और समृद्धि आती है।

रवि पुष्य के शुभ संयोग में किया जाएगा अहोई अष्टमी व्रत

पं. लक्ष्मीकांत शर्मा मंशापूर्ण मंदिर ने बताया कि हर वर्ष कार्तिक मास की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। इस वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत 8 नवंबर को किया जाएगा। करवा चौथ की तरह ही अहोई अष्टमी का व्रत भी महिलाएं निर्जला रहकर ही करती हैं और तारों को देखकर ही व्रत को खोलती है इसे अहोई अष्टमी या अहोई माता का व्रत भी कहा जाता है। यह व्रत महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु और उन्हें हर तरह की विपत्ति से बचाने के लिए माताएं करा करती हैं, कुछ निसंतान महिलाएं सन्तान प्राप्ति के लिए भी अहोई माता का व्रत करती हैं।
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