कुपोषण दूर करने चल रहा पोषण अभियान सिर्फ कागजों में, बजट लग रहा ठिकाने @Shivpuri News

शिवपुरी। कुपोषण को दूर करने के लिए जिले भर में पोषण अभियान सहित कई अभियान चलाए जा रहे हैं लेकिन यह अभियान सिर्फ कागजों में चल रहेे हैं, जमीनी हकीकत देखा जाए तो कुछ भी नहीं है। वहीं सरकार द्वारा हर साल लाखों रुपए का बजट कुपोषण की िस्थति को सुधारने के लिए भेजा जाता है लेकिन स खुर्दबुर्द कर दिया जाता है। गांव व टोलों में रहने वाले आदिवासी बच्चों की हालत कुपोषण उन्मूलन के दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। बीते रोज अस्पताल में दो कुपोषित बच्च्ेे आए जिनमें तेंदुआ से आए एक बच्चेे की उम्र 2 साल थी, डॉक्टरों के अनुसार उसका बजन 13 किलो के करीब होना चाहिए लेकिन वह वह 5 किलो से भी कम है। वहीं एक बच्ची है जिसका वजन 10 किलो होना चाहिए लेकिन वह महज साढ़े चार किलो की है। इन बच्चों का इलाज शिवपुरी मेें चल रहा है। यह कहानी मात्र दो बच्चों की नहीं हैै बल्कि गांव व मजरों में कुपोषण की िस्थति अति गंभीर है। आंगनबाड़ी से लेकर स्वास्थ्य विभाग के जरिए पिछले एक दशक से लाखों रुपए बजट फूंककर चलाए जा रहे साप्ताहिक मासिक और वार्षिक अभियानों की कलई खोल रहे हैं।

एनआरसी में नहीं मिल रही उचित देखभल, बच्चों वापस ला रहे मां-बाप
गंभीर कुपोषित बच्चों के लिए जिले में हर विकासखंड स्तर पर एक एक एनआरसी खोली गई हैं जिनमें कुपोषित बच्चों को भर्ती कर उनका उपचार कर उन्हें कुपोषण मुक्त करना चाहिए लेकिन यहां अधिकारियों के दबाव के चलते मां बाप बच्चों को तो ले आते हैं लेकिन उनका पूरा उपचार नहीं कराते हैं। क्योंकि यहां उनके माता पिता के साथ भी अच्छा व्यवहार नहीं होता तो दूसरी ओर उनके सामने रोजगार की भी समस्या रहती हैं इस कारण से मां बाप इन कुपोषित बच्चों को बिना इलाज कराए या फिर आधा अधूरा इलाज कराकर वापस अपने घर ले जाते हैं। 

बाजार में बिक रहा पोेषण आहार
बता दें कि आंगनबाड़ी में मिलने वाला पोषण आहार नहीं बट रहा है और बाजार में बेचा जा रहा है लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर अन्य लोगों के मिले होनेे के कारण लाखाों रुपए से आए पोषण आहर का बंदरबांट किया जा रहा है और सब ने अपनी आंखाों पर पट्टी बांध रख साइलेंट सहयोगी बने हुए हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से लेकर सुपरवाईजर व समूह संचालक से लेकर आला अधिकारी का पूरा रैकेट इसमें काम करता है जिसके बाद यह मिलने वाला पोषण आहार बाजार में बिकता है। 

कच्ची उम्र में विवाह भी दे रहा कुपोषण को जन्म
आदिवासी समुदाय में कम उम्र में विवाह कर दिया जाता है जिसके चलते आदिवासी महिलाएं कच्ची उम्र में ही मां बन जाती हैं और बच्चे कमजोर पैदा होते हैं इतना ही नहीं गर्भवती महिलाओं के लिए भी पोषण को लेकर अभियान तो चलते हैं लेकिन उन्हें भी पोषण आहार पर्याप्त उपलब्ध नहीं कराया जा रहा जिससे हालात बिगड़ जाते हैं और कुपोषण की चपेट में जन्म लेने वाले बच्चे आ जाते हैं। वहीं समाजसेेवी संस्था से लेकर शासकीय विभाग सिर्फ ऑफिसों में बैठकर ही अपनी कार्रवाई को अंजाम देने में जुटे हुए हैं। 
 
यह बोले अधिकारी

कुपोषण को खत्म करने के लिए हम प्रयास कर रहे हैं। गांव गांव अभियान चला रहे हैं। कुपोषित बच्चों के लिए एनआरसी सेंटर भी बनाए गए हैं। फिर भी कुछ बच्चे कुपोषित सामने आ रहे हैं। हम उनका इलाज भी करवा रहे हैं।

देवेन्द्र सुंदरियाल, अधिकारी महिला बाल विकास विभाग शिवपुरी।
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