पोहरी उपचुनाव विशेष : किसी के बनने में किसी के बिगड़ेंगे समीकरण

अजय सिंह कुशवाह शिवपुरी। ज़िले की पोहरी विधानसभा सीट पर सियाशी घमासान चरम पर पहुंच गया है। यहाँ से सिंधियानिष्ठ पूर्व काँग्रेसी विधायक सुरेश राठखेड़ा भाजपा के संभावित अधिकृत उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। वहीं अब  काँग्रेस के सामने राठखेड़ा की टाटा बाय बाय के बाद विजयी उम्मीदवार ढूंढने की चुनौती है।क्योंकि ये सीट सिंधिया परिवार के प्रभाव वाली सीट मानी जाती है। सुरेश राठखेड़ा जहाँ ज्योतिरादित्य सिंधिया के आशीर्वाद का परिणाम हैं तो राठखेड़ा से पूर्व लगातार दो बार विधायक रहे प्रहलाद भारती की गिनती पूर्व केबीनेट मंत्री यशोधराराजे सिंधिया के कट्टर समर्थकों के तौर पर की जाती है। अब काँग्रेस को इन दोनों सिंधिया राजपरिवार के सदस्यों के  वर्चस्व का सामना करना होगा।
 पोहरी विधानसभा का चुनावी गणित बहुत हद तक जातीय समीकरणों पर निर्भर करता है । यहां आदिवासी एवं अनुसूचित जाति के मतों की संख्या सर्वाधिक लगभग 45-45हज़ार के आसपास है।दूसरे नम्बर पर धाकड़(किरार) समाज लगभग 40 हज़ार मतों के साथ आता है।इसके अलावा काछी(कुशवाह),यादव ,रावत, ब्राह्मण,ठाकुर आदि मत भी प्रभावी गिनती रखते हैं। किरार जाति के लगभग 40 हजार एकमुश्त वोटों के कारण यहाँ राठखेड़ा और उनसे पूर्व दो बार विधायक बने प्रहलाद भारती भी किरार समाज से होने के नाते सफल हुए, ऐसा माना जाता है। इसके पूर्व भी प्रहलाद भारती के चाचा एडवोकेट जगदीश वर्मा 1990 में एवं 1993 में  वैजयंती वर्मा किरार प्रत्याशी के रूप में सफलता दर्ज करा चुकी हैं।इसलिए किरार समाज के वोट को यहाँ निर्णायक वोटबैंक माना जाता है। बाकी वोटों में बँटवारा हो जाता है।
          वर्तमान परिदृश्य का आंकलन करें तो किरार समाज के राठखेड़ा भाजपा प्रत्याशी हैं तो काँग्रेस  भी किरार समाज के किसी प्रभावशाली चेहरे की तलाश पर ध्यान केंद्रित कर रही है, ताक़ि इस समाज का वोटबैंक विभाजित कर भाजपा प्रत्याशी के जातीय समीकरण वाले फैक्टर को प्रभावहीन किया जा सके।काँग्रेस में जिन किरार समाज के नामों पर गंभीरता से विचारविमर्श किया जा रहा है उनमें प्रमुख रूप से पूर्व विधायक जगदीश वर्मा के पुत्र एड.प्रधुम्न वर्मा पप्पन ,पोहरी जनपद अध्यक्ष प्रधुम्न वर्मा , पूर्व जिलाध्यक्ष एड. लक्ष्मीनारायण धाकड़ ,बार कौंसिल के अध्यक्ष एड.विनोद धाकड़ एवं एड.आनंद धाकड़ के नाम प्रमुख हैं।यदि पोहरी के इतिहास को उठा कर देखें तो मज़बूत राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से जुड़े प्रधुम्न वर्मा पप्पन के नाम को तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा वजनदार माना जा रहा है। इन्हें समाज के वोटों के साथ साथ विवादरहित चेहरा होने का लाभ मिलने की संभावना अधिक है। ब्राह्मण उम्मीदवार के नाम पर एकमात्र नाम हरिवल्लभ शुक्ला का आता है,किंतु जातीय गणित पर आधारित इस क्षेत्र का चुनाव उनकी दावेदारी को कमज़ोर बना रहा है। ये भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस से टिकट कटने पर वे बसपा या निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सामने आ सकते हैं।

*बाहरी चेहरे पर भी दांव लगा सकती है कांग्रेस*

विचार-मंथन के दौर से गुजर रही कांग्रेस,किसी बाहरी चेहरे पर भी गंभीरता से सोच रही है ,जिनमें संभावित नाम संभावित नामों में पूर्व मंत्री रामनिवास रावत और ग्वालियर से पार्टी के वरिष्ठ नेता अशोक सिंह यादव  के नाम पर भी  सामने आ रहे हैं। हालांकि सिंधियानिष्ठ शिवपुरी जनपद अध्यक्ष पारम रावत के निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरने की घोषणा को रामनिवास रावत की उम्मीदवारी  को रोकने की दिशा में उठाया गया कदम ही माना जा रहा है। लेकिन अशोक यादव ने ग्वालियर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में  2019 के चुनाव में पोहरी विधानसभा से जीत हासिल की थी अतः उनके नाम को ज्यादा वजन दिया जा रहा है।

*दोनों दलों की निगाहें बसपा के कैलाश पर*

पिछले विधानसभा चुनाव में 52736  मतों के साथ दूसरे नम्बर पर रहे बसपा के उम्मीदवार कैलाश कुशवाह पोहरी के मैदान में एक  अहम किरदार की भूमिका निभा सकते हैं। लगभग 20 हज़ार सामाजिक वोट और बसपा का वोट बैंक ही कैलाश को सभी दलों के लिए चिंता का विषय बना देता है।ज्ञानियों की बात मानें तो कैलाश पर कांग्रेस भी दांव लगाने पर विचार कर सकती है।वहीं भाजपा कैलाश को अपने पाले में खींचने की फ़िराक़ में है। यदि कैलाश पुनः बसपा से ही मैदान में आते हैं तो निसन्देह त्रिकोणीय मुकाबला कांटे का होगा।
कुल मिलाकर पोहरी का संग्राम किसी भी दल और प्रत्याशी के लिए आसान नही होगा और सभी प्रमुख दल इस बात को भलीभाँति से समझ भी रहे हैं।
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